परित्राणाय
साधुनाम विनाशाय च: दुष्कृताम
बाँसुरी
बजती रहे मैं चाहता हूँ ,
प्रेम
पुष्प खिला रहे मैं चाहता हूँ ।
शान्ति
की सरिता न सूखे इसलिए बस,
शंख-ध्वनि
गूँजे गगन में चाहता हूँ ।
(1)
है अँधेरा
विश्व में असमानता का ,
है उजाला दूर
बहुत समानता का ।
है किसी के पास
दौलत खेलने को ,
कुछ बिताते
लोग जीवन दासता का ।
सिर्फ है
पहचान धन ही भद्रता की ,
धन अदालत में
जरूरत सत्यता की ।
हो सुदामा,
कृष्ण फिर चाहता हूँ ,
शंख-ध्वनि
गूँजे गगन में चाहता हूँ ।
(2)
बीस रूपये
खर्च जो थे रोज करते ,
तीस रूपये
खर्च वो हैं आज करते ।
भूल मँहगाई
गये नेता इसी से ,
‘अब गरीबी घट
गयी’ कह
दम्भ भरते।
पर गरीबी तो
मिटेगी बस जतन से ,
पार्थ-सम
अधिकार के प्रति जागरण से ।
युवक त्याग
विषाद जागे चाहता हूँ ,
शंख-ध्वनि
गूँजे गगन में चाहता हूँ ।
(3)
नारियों के
शील की रक्षा करे हम ,
भीङ से
दुर्योधनों की क्यों डरे हम ।
शकुनी,
जयद्रथ और दुःशासन डरे अब ,
ले सुदर्शन
चक्र साहस का लङे हम ।
भूल द्वापर
की न होगी पार्थ प्रण ले ,
कर्ण की
जिह्वा कटे तत्काल प्रण ले ।
विदुर विवश
नहीं रहें मैं चाहता हूँ ,
शंख-ध्वनि
गूँजे गगन में मैं चाहता हूँ ।
(4)
देश से बढकर
नहीं संकल्प कोई ,
धर्म तजकर
नमक का न महत्व कोई ।
दल हमारा
धर्म-पालन के लिए हो ,
अन्यथा
दल-निष्ठ होना पाप कोई ।
चेतना का
पाँचजन्य प्रबल गुँजाए ,
स्वार्थ जैसे
शत्रुओं को हम भगाए ।
दुर्गुणों से
युध्द हो मैं चाहता हूँ ,
शंख-ध्वनि
गूँजे गगन में मैं चाहता हूँ ।
(5)
सत्य
शंकित-सा खङा न्यायालयों में ,
शान्ति भी
मिलती नहीं देवालयों में ।
शर्म-सार
हुयी यहाँ इंसानियत है ,
जहर भोजन में
मिला विद्यालयों में ।
धर्म आज
अधर्म से आक्रांत-सा है ,
युवक अर्जुन
आज भी भ्रांत-सा है ।
कृष्ण फिर
गीता पढाये चाहता हूँ ,
शंख-ध्वनि
गूँजे गगन में चाहता हूँ ।
(6)
उर्वशी से बच
सके तो साथ हूँ मैं ,
शुध्द अंतः
करण है तो साथ हूँ मैं ।
धर्मराज दिखे
अगर मुझको कहीं तो ,
भीष्म से भी
सामना हो तो साथ हूँ मैं ।
युद्ध द्वापर
में नहीं मैंने किया था ,
पाण्डवों का
पथ प्रदर्शन ही किया था ।
पार्थ-सा
धीरज धरो रथ हाँकता हूँ ,
शंख-ध्वनि
गूँजे गगन में चाहता हूँ ।
(चंद्रवीर)
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