सोमवार, 5 अगस्त 2013

आदमी ही आदमी का शत्रु है

 जो हुए बर्बाद दुख इस बात का तो कम हुआ,
जो चुने शक की सुई उन पर गई तो गम हुआ;
अलखनंदा या कि गंगा सिमटती है सब नदी,
हाय ! नेता मिला गए भूमाफिया से, तम हुआ;
खुब राहत परा सियासत हो रही है देख ले,
है सियासत वोट की व्यापर को पहचान ले;
ये विनाश विकास का फल--------------?

है नहीं ऐसा कि मै संवेदना से शून्य हूँ,
वज्र का दिल है नहीं मेरा, नहीं मै  क्रूर हूँ ;
मन विदारक आपदा पर आज रो तो लू मगर,
वृक्ष रोप बबूल का लूँ, शूल ही मजबूर हूँ;
अत: रोना छोड़ शासन को जगाए, हम जगे,
तंत्र को दे यन्त्र चिंतन का प्रशासक भी जगे;
कष्ट का पुरुषार्थ ही उपचार है हम जान ले,
ये विनाश विकास का फल तो नहीं जान ले ?


चन्द्र वीर
के - 117, पालिका आवा
सरोजनी नगर
नई दिल्ली - 110023
मो - 9868177913  

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