रक्षा करो कष्ट हरो सुनलो पुकार प्रभु,
मचा हाहाकार घोर अंधकार छाया है।
अंक कलिकाल के पलटने लगे हैं नाथ,
राजाओँ ने प्रजाओँ के कोष को चुराया है।
कामिनी, कंचन, कीर्ति व्याप्त जन जन में
है,
ज्ञानियों ने मेनका को गोद में बिठाया है।
स्वाद और वाद के विवाद में पड़ा है
राष्ट्र,
मिथ्या महारानी बनी सत्य को हराया है।
सुना है अनाथ के भी नाथ प्रभु दीनानाथ,
दयासिंधु दया करो भक्त भी सनाथ हो।
संकट निशा का भोर करदो कृपा की कोर,
नाचे मनमोर कभी नीचा नहीं माथ हो।
नयन हैं बेचैन मेरी लेखनी में वैन नहीं,
राधा संग दरश देना किंतु चक्र साथ हो।
अनुनय विनय विनम्र यही बार बार,
धर्म ध्वज झुके नहीं भले रक्तपात हो।
अब क्यों विलंब कृष्ण कर में उठाओ चक्र,
पहुंचा है शिशुपाल अंतिम चरण में।
नीति में निपुण नाथ समय न प्रीति का है,
प्रश्न चिह्न लग जायेगा तुम्हारे प्रण
में।
एक बार फिर से दिखाइये विराट रूप,
शत्रु त्राहिमाम कर पहुंचे शरण में।
मातृभूमि रक्षा हेतु कलम कृपाण कर,
हम भी चलेंगे प्रभु राष्ट्र रक्षा रण में।
कवि विनय विनम्र
9899631046
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