बुधवार, 28 अगस्त 2013

परित्राणाय साधुनाम विनाशाय च: दुष्कृताम



परित्राणाय साधुनाम विनाशाय च: दुष्कृताम


बाँसुरी बजती रहे मैं चाहता हूँ ,
प्रेम पुष्प खिला रहे मैं चाहता हूँ ।
शान्ति की सरिता न सूखे इसलिए बस,
शंख-ध्वनि गूँजे गगन में चाहता हूँ ।


(1)
है अँधेरा विश्व में असमानता का ,
है उजाला दूर बहुत समानता का ।
है किसी के पास दौलत खेलने को ,
कुछ बिताते लोग जीवन दासता का ।
सिर्फ है पहचान धन ही भद्रता की ,
धन अदालत में जरूरत सत्यता की ।
हो सुदामा, कृष्ण फिर चाहता हूँ ,
शंख-ध्वनि गूँजे गगन में चाहता हूँ ।

(2)
बीस रूपये खर्च जो थे रोज करते ,
तीस रूपये खर्च वो हैं आज करते ।
भूल मँहगाई गये नेता इसी से ,
अब गरीबी घट गयीकह दम्भ भरते।
पर गरीबी तो मिटेगी बस जतन से ,
पार्थ-सम अधिकार के प्रति जागरण से ।
युवक त्याग विषाद जागे चाहता हूँ ,
शंख-ध्वनि गूँजे गगन में चाहता हूँ ।
(3)
नारियों के शील की रक्षा करे हम ,
भीङ से दुर्योधनों की क्यों डरे हम ।
शकुनी, जयद्रथ और दुःशासन डरे अब ,
ले सुदर्शन चक्र साहस का लङे हम ।
भूल द्वापर की न होगी पार्थ प्रण ले ,
कर्ण की जिह्वा कटे तत्काल प्रण ले ।
विदुर विवश नहीं रहें मैं चाहता हूँ ,
शंख-ध्वनि गूँजे गगन में मैं चाहता हूँ ।

(4)
देश से बढकर नहीं संकल्प कोई ,
धर्म तजकर नमक का न महत्व कोई ।
दल हमारा धर्म-पालन के लिए हो ,
अन्यथा दल-निष्ठ होना पाप कोई ।
चेतना का पाँचजन्य प्रबल गुँजाए ,
स्वार्थ जैसे शत्रुओं को हम भगाए ।
दुर्गुणों से युध्द हो मैं चाहता हूँ ,
शंख-ध्वनि गूँजे गगन में मैं चाहता हूँ ।

(5)
सत्य शंकित-सा खङा न्यायालयों में ,
शान्ति भी मिलती नहीं देवालयों में ।
शर्म-सार हुयी यहाँ इंसानियत है ,
जहर भोजन में मिला विद्यालयों में ।
धर्म आज अधर्म से आक्रांत-सा है ,
युवक अर्जुन आज भी भ्रांत-सा है ।
कृष्ण फिर गीता पढाये चाहता हूँ ,
शंख-ध्वनि गूँजे गगन में चाहता हूँ ।
(6)
उर्वशी से बच सके तो साथ हूँ मैं ,
शुध्द अंतः करण है तो साथ हूँ मैं ।
धर्मराज दिखे अगर मुझको कहीं तो ,
भीष्म से भी सामना हो तो साथ हूँ मैं ।
युद्ध द्वापर में नहीं मैंने किया था ,
पाण्डवों का पथ प्रदर्शन ही किया था ।
पार्थ-सा धीरज धरो रथ हाँकता हूँ ,
शंख-ध्वनि गूँजे गगन में चाहता हूँ ।


(चंद्रवीर)




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